राजपाट

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ये नेता भड़कते क्यों हैं

राजनीति में जाने के बाद नेता और मंत्री कुछ करें या ना करें लेकिन भड़कते जरूर हैं। इन दिनों आपने देखा और सुना होगा कि मंत्री जी भड़क गए। आजकल सुशासन तिहार के साथ भड़कने का तिहार भी चल रहा है। बड़े से बड़ा और छोटे से छोटा नेता भड़क रहा है। बेमेतरा में कन्या विवाह के कार्यक्रम में विधानसभा अध्यक्ष डॉक्टर रमन सिंह, प्रशासन पर इसलिए भड़क गए क्योंकि कार्यक्रम मुख्यमंत्री की गरिमा के अनुकूल नहीं था। जिनको भड़कना था वो तो ” कूल ” थे लेकिन भड़क कोई और गया। रायपुर से लगे आरंग में और गोबरा नवापारा में रायपुर के सांसद बृजमोहन अग्रवाल अधिकारियों पर भड़क गए। उनका कहना था कि अधिकारियों की कार्यशैली ठीक नहीं है। बिलासपुर के गोढ़ी में सुशासन तिहार चल रहा था तो विधानसभा के पूर्व अध्यक्ष और बिल्हा के विधायक धरमलाल कौशिक भी भड़क गए। कौशिक जी को भड़कता देख कांग्रेस के नेता राजेंद्र शुक्ल भी भड़क गए। सरकार के एक मंत्री दयाल दास बघेल भी एक दिन इसलिए भड़क गए कि पुलिस शराब तस्करों को संरक्षण दे रही है। एक अन्य विधायक रोहित साहू एक पटवारी पर भड़क गए। हाल ही में सीतापुर के विधायक रामकुमार टोप्पो और नायब तहसीलदार एक दूसरे पर भड़क चुके हैं। इस नायब तहसीलदार पर विधायक जी क्या भड़के कि पूरा तहसीलदार संघ ही राज्य सरकार पर भड़क गया। जिसे मुख्यमंत्री जी ने बड़ी शालीनता से शांत किया। इस भड़कने की प्रक्रिया में एक बात कॉमन है कि ये सब प्रशासन पर ही भड़क रहे हैं जो अपनी गैर जिम्मेदाराना हरकतों से बाज नहीं आता। हालांकि कांग्रेस के एक नेता को इस प्रशासन से बड़ी हमदर्दी है उन्होंने तो एक वीडियो जारी कर कहा कि प्रशासन आपका गुलाम नहीं है इसलिए भड़को मगर प्यार से। अब नेताजी को कौन समझाए कि प्रशासन ट्रक के पीछे लगी प्लेट थोड़ी है जिस पर लिखा हो देखो मगर प्यार से।

एक साधे सब सधे

हमारे यहां एक कहावत है एक को साधे सब सधे … सत्ता के गलियारों के इर्द गिर्द घूमने वाले व्यापारी, पत्रकार, छुट भैया नेता और कुछ मझोले किस्म के अधिकारी इस कहावत को खूब पहचानते हैं। यही वजह है कि आने वाले समय को ये लोग भांप लेते हैं और राज्य के उभरते हुए नेता से लेकर नए-नए जिलों से जो अधिकारी या नेता आते हैं ये उनसे दोस्ती और निकट वाले संबंध बना लेते हैं, और भविष्य में उसका लाभ लेना तो आम बात ही समझिए। अब रायपुर में बहुत सारे लोग कलेक्टर रहे हैं। अब उनमें से कोई सचिव मुख्यमंत्री है कोई किसी और पदस्थापना में। अलग-अलग जिलों में रहे आईएएस-आईपीएस के साथ उन जिलों के कुछ नेताओं की तो कुछ पत्रकारों की सांठगांठ है और उनके संबंध अच्छे हैं। अब वह अपने संबंधों का फायदा लेकर ठेके प्राप्त कर रहे हैं। कहीं अपने मीडिया हाउस के लिए पैसे जुटा रहे हैं। मेरिट-डिमैरिट सब एक तरफ है और संबंध एक तरफ। इनकी इस हरकतों से यह मैसेज ऊपर तक चला जाता है कि यह हाउस का बहुत खास है, यह मंत्रालय का खास है, यह मंत्री जी के खास हैं जबकि ये कोई  खास वास नहीं होते हैं। वहीं कुछ लोग सबके खास होते हैं कहते हैं ना कि ” जैसे चले बाजार पीठ को तैसी कीजिए ” इस कला के महारथी हर जगह अपना काम निकालना जानते हैं। बस आप में प्रतिभा हो या ना हो आप डिजर्व करते हो या ना करते हो, अगर आप सत्ता में बैठे किसी भी व्यक्ति को साध लेते हैं उससे कनेक्शन बना लेते हैं तो इस प्रभाव मंडल के आगे सारी प्रतिभा गौण हो जाती है और आपकी सेटिंग महत्वपूर्ण हो जाती है। राज्य बनने के बाद पिछले 25 सालों में जिनका अंपायर बढ़ा है, जिन्होंने कॉलोनाइजर के रूप में, पत्रकार के रूप में, ट्रेड के रूप में अनाप-शनाप तरक्की की है या अपना विस्तार किया है, उनके पास यही एक फार्मूला है “ एक को साधे सब सधे “।

महफिल किसी की लूट रहा कोई और है

प्रदेश में बहुत सारे गैर सरकारी आयोजन होते हैं और हर आयोजन की मांग मुख्यमंत्री ही होते हैं। हर जगह मुख्यमंत्री जाएं यह संभव भी नहीं है फिर भी लोग बहुत मशक्कत करके मुख्यमंत्री को बुलाते हैं। इन आयोजनों में होता यह है कि ऐसे लोग जिनमे मंत्री भी शामिल हैं और जो वाकपटु भी हैं, जिनकी भाषण कला अच्छी है, जिनको बहुत सारे संदर्भ याद हैं। ऐसे मंत्री और नेता महफ़िल लूटने के इरादे से इन आयोजनों में जाते हैं और मुख्यमंत्री से पहले भाषण देकर महफ़िल लूटने की पूरी कोशिश करते हैं। वहीं जब मुख्यमंत्री का भाषण होता है तो वे अपनी मर्यादा के चलते इन नेता और मंत्रियों की तरह लच्छेदार बातें नहीं कर पाते या वे वही कहते हैं जो उनका विभाग उन्हें लिखकर देता है। कार्यक्रम के बाद यही मंत्री और नेता अपने जानने वालों से पूछते हैं कैसा रहा मेरा भाषण ? मुख्यमंत्री के भाषण से अधिक तालियां मेरे भाषण में बजी ना ? मुख्यमंत्री के शुभ चिंतकों को अब यह देखना होगा कि मुख्यमंत्री के कार्यक्रम में कौन मंच पर होगा और कौन भाषण देगा। कम से कम उन मंत्रियों, सांसदों और नेताओं को मुख्यमंत्री के कार्यक्रमों से दूर ही रखें जो मंच पर ही वाचाल होकर मुख्यमंत्री को ही नीचा दिखाने का प्रयास करते हैं।

रुपया पैसा, सम्मान कमीशन 

लोग अक्सर कहते हैं कि या तो आप इज्जत कमा लो या पैसा ….. पैसे कमाने के लिए कई बार अपनी इज्जत को दांव पर रखना पड़ता है। पहले जो नेता होते थे या सीनियर अफसर,वह सरेआम ना तो लोगों से पैसे मांगते थे और ना ही अपने अधीनस्थ को भ्रष्टाचार में शामिल करते थे। लेकिन पिछले कुछ सालों में पूरी बेशर्मी से पंचायत से लेकर मुख्यालय तक कमीशन तय है। पहले छोटे से छोटा डिपार्टमेंट का अधिकारी बड़े साहब तक पैसे देने नहीं जाता था। लेकिन अब अधिकारी चाहे छोटे स्तर का हो, वह स्थानीय नेता से लेकर मंत्री के बंगले तक पैसे पहुंचाने की बात करता है।कोई विभाग हो कोई अधिकारी हो सब मुंह खोलकर पैसे मांग लेते हैं हर चीज में कमीशन मांगते हैं तो इन लोगों की काहे की इज्जत। पहले अधिकारी अपने कक्ष में बड़े बड़े नेताओं और महापुरुषों की फोटो लगाते थे परन्तु अब तो नेता ही खरीद लेते हैं तो उनके फोटो लगाने की क्या जरूरत ? क्योंकि जब सब माल बिकाऊ है तो इज्जत कहां से मिलेगी। छत्तीसगढ़ में अभी नेता, अधिकारियों और कर्मचारियों के बीच जो भी विवाद है उसमें सभी तरफ से जो उच्छृंखलता दिखाई देती है। उसका एक बड़ा कारण यह है कि सारी मयार्दा तारतार हो गई है। अभी कोई भी किसी भी स्तर का अधिकारी वरिष्ठ अधिकारी के घर में पैसे पहुंचा सकता है। मंत्री के बंगले के बारे में उसको मालूम है कि वहां किसको पैसे देना है। पहले इतनी हिम्मत किसी की नहीं होती थी। सबका साथ सबका विकास और सबका विश्वास जैसे सूत्र वाक्य को लोगों ने मलिन कर दिया है।जैसे एक समय जब गांधी जी ने कहा था कि सारे कांग्रेसी जमीन से जुड़कर काम करें तो बहुत सारे कांग्रेसियों ने जमीन का धंधा शुरू कर दिया था। उसी तरह अब सारे भेद खत्म हो गए हैं। जनप्रतिनिधि के लिए आदेश सरकार को जारी करना पड़ रहा है कि जब विधायक या सांसद आए तो अधिकारी उनको देखकर खड़े हों। ऐसा इसलिए हो रहा है क्योंकि जनप्रतिनिधियों के लिए सम्मान कम होता जा रहा है। इसी तरह वरिष्ठ अधिकारियों के लिए सम्मान खत्म हो गया है क्योंकि नीचे वाला जानता है कि यह तो मेरे से पैसे लेता है। राजनीतिक पार्टी के कार्यकर्ता के प्रति विश्वास भी इसलिए खत्म हो रहा है कि वह अपनी सत्ता के समय वसूली करने पहुंच जाता है। दुर्भाग्य से इस गठजोड़ का हिस्सा मीडियाकर्मी भी हैं। जिनके अपने काउंटर खुले हुए हैं जब इनके भी समीकरण बिगड़ते हैं तब ये भी मीडिया पर हमला जैसा हल्ला मचाते हैं। हिंदी के महाकवि गोपालदास नीरज की एक कविता है   …….” नेताओं ने गांधी की कसम तक बेची, कवियों ने निराला की कलम तक बेची, मत पूछ इस दौर में क्या क्या न बिका, इंसानों ने आंखों की शर्म तक बेची  ….” 

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