
राजपाट
तेली का तेल जले मशालची का दिल जले
ये आम बोलचाल में एक बहुत पुरानी कहावत है जिसे हमने संसदीय भाषा में लिखा है। अब ये जान लीजिये कि ये कहावत प्रदेश के सत्ता संघर्ष में कैसे चरितार्थ हो रही थी। सबको पता है कि प्रदेश की सत्ता में 2005 बैच के नौकरशाहों का खासा दबदबा है इनकी मर्जी के खिलाफ कुछ हो ये इन्हे नागवार गुजरता है। सिरे से शीर्ष तक इनका गिरोह राज्य सरकार के हर महत्वपूर्ण फैसलों को प्रभावित करने में लगा रहता है। इस ग्रुप ने मुख्यमंत्री सचिवालय में बाकायदा अपना एक धुरंधर (हमजा मजारी) बिठा रखा है। मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय से लेकर मुख्यमंत्री सचिवालय और उसके बाहर भी सबको पता है कि यह धुरंधर हमारे बीच रहकर दूसरों के लिए काम करता है। एक साल से अधिक समय तक इनकी गतिविधियों को देखने के बाद आखिरकार मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय ने इस धुरंधर अधिकारी के पर क़तर ही दिए। दरअसल व्यवस्था में विकास प्रवाहित करने के लिए जरुरी अर्थतंत्र इनके नियंत्रण में था। विकास कार्यों के लिए बजट में राशि का प्रावधान किये जाने के बाद भी बड़े बड़े मंत्रियों और अधिकारियों को अपने विभाग की राशि प्राप्त करने के लिए इनके आगे याचक की तरह पेश होना पड़ता था। इस पर भी ये साहब स्वीकृत राशि में भी कैंची चला दिया करते थे। ऊपर से सलाह ये कि इतने पैसों का क्या करोगे। स्वीकृत बजट की राशि में कटौती से सभी मंत्री और विभागों के सचिव त्रस्त हो गए थे। साहेबान का हौसला इतना बढ़ गया कि ये मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय की घोषणाओं को लागू करने के लिए भी राशि जारी करने में आनाकानी करने लगे थे। जब बातें बढ़ गई तो मुख्यमंत्री ने दो दिन पहले हुई प्रशासनिक सर्जरी में इन साहब के पर क़तर दिए और अर्थतंत्र का केंद्र एक दूसरे साहब के कक्ष में स्थापित कर दिया। अब आप ही सोचो कि पैसा जनता का, कार्य जनता के लिए और आदेश मुख्यमंत्री का फिर भी अड़ंगेबाजी क्यों ?? इसीलिए सत्ता की वीथिकाओं में यह पुरानी कहावत गूंजने लगी थी “तेली का तेल जले, मशालची का दिल जले……..”. .
शौक से डूबे जिसे डूबना है
पूर्व प्रधानमंत्री स्वर्गीय अटल बिहारी वाजपेयी ने एक सार्वजनिक कार्यक्रम में कहा था कि अमूमन सत्ता का चरित्र एक जैसा होता है पार्टियां बदल जाती है लेकिन सत्ता अपना चरित्र नहीं छोड़ती।सत्ता का चरित्र क्या होता है ये बताने की यहाँ जरुरत नहीं है। इसीलिए ऐसा लग रहा है कि छत्तीसगढ़ में भाजपा की सरकार और उसके मंत्री अपने सबसे बड़े नेता की बात को सार्थक बनाने में लग गए हैं, लेकिन इस कार्य में उन्हें कई तरह की अड़चनें आ रही हैं। बताते हैं कि साय सरकार के कुछ कद्दावर मंत्री अपने विभाग के सचिव से खुश नहीं थे। इसका एक कारण यह भी हो सकता है कि मंत्री जी सत्ता के चरित्र में बने रहना चाहते हैं और ये अधिकारी उसमें बाधा बन रहे हैं। मंत्रियों की अधिकारियों से नाराजगी का एक शाश्वत कारण माना जाता है कि अधिकारी सुनते नहीं हैं। कोई मंत्री यह नहीं बताता कि उसने कहा क्या जो सुना नहीं गया। कोई बात नहीं इन मंत्रियों की गुहार मुख्यमंत्री साय जी ने सुन ली। सड़क और नगरीय विकास से जुड़े एक मंत्रीजी को ऐसे अधिकारी दे दिए जिनसे मुख्यमंत्री जी खुद ही खफा चल रहे थे। अब इन मंत्री जी को 2005 बैच के दो अधिकारीयों से भिड़ना होगा। वहीं इन मंत्रीजी के समकक्ष दूसरे कद्दावर मंत्री जी के विभाग में दो धाकड़ महिला अधिकारीयों की पोस्टिंग कर दी गई। अब बात तीसरे मंत्रीजी की ये अपने शिक्षा विभाग में एक काबिल अधिकारी चाहते थे तो इन्हे एक ऐसा अधिकारी दिया जो सड़क बनाने के काम में लगे थे। अब ये तो समय बताएगा कि शिक्षा सड़क पर आएगी या आसमान की ऊंचाइयों पर। कहानी यहीं खत्म नहीं होती, राज्य में एक वरिष्ठ आदिवासी मंत्री हैं कभी ये मुख्यमंत्री की दौड़ में शामिल थे। वर्तमान में खेतीबाड़ी से जुड़े हैं। इनकी भी यही शास्वत शिकायत कि अधिकारी सुन नहीं रहे। जानकार बताते हैं कि इनके विभाग में बीज, रासायनिक उर्वरक, कीटनाशक और अन्य सामानों की खरीदी में मनमानी चल रही है। इस राम नाम की लूट को विभाग की महिला अधिकारी होने नहीं दे रही हैं। इसलिए शिकायत तो बनती है। मुख्यमंत्री जी ने इस महिला अधिकारी को महिलाओं के विभाग में ही भेज दिया और उनकी जगह दूसरे ऐसे अधिकारी को भेजा जो मंत्री जी की सुने। अब इस सुनने सुनाने के दौर से बात आगे निकल चुकी है अटलजी की सीख भी बहुत पीछे छूट गई है इसे अब समझना है तो दुष्यंत कुमार की यह पंक्ति सुन लीजिए ….” हो गई घाट पर पूरी व्यवस्था, शौक से डूबे जिसे डूबना है ”
समय पर हो पाएगी पीसीसीएफ की नियुक्ति
इस महीने के अंत में प्रदेश के वन विभाग के मुखिया श्रीनिवास राव रिटायर हो रहे हैं। अब सबको इंतजार और उत्सुकता है कि अगला पीसीसीएफ यानी प्रधान मुख्य वन संरक्षक कौन होगा। राज्य सरकार को इस नियुक्ति के साथ साथ मुख्य वन बल संरक्षक के पद पर भी नियुक्ति करना है। फ़िलहाल यह दोनों पद श्रीनिवास राव के पास ही है। सामान्य प्रक्रिया में ऐसा होता है कि विभागीय पदोन्नति समिति की बैठक हो और इन दोनों पदों पर नियुक्ति कर दी जाए लेकिन यह इतना सामान्य भी नहीं है। बीते दिनों विभाग में पदोन्नति समिति की बैठक होने वाली थी लेकिन अचानक उसे टाल दिया गया, तभी से से इस पद पर होने वाली नियुक्ति लेकर चर्चा गरमा गई है। थोड़ी पुरानी बात कर लेते हैं जब प्रदेश में भारतीय जनता पार्टी की सरकार बनी तब पुलिस महानिदेशक, मुख्य सचिव और प्रधान मुख्य वन संरक्षक के पद पर अशोक जुनेजा, अमिताभ जैन और श्रीनिवास राव पदस्थ थे। विष्णुदेव साय सरकार ने तमाम दबाव के बाद भी इनमें से किसी को नहीं हटाया। चूँकि अशोक जुनेजा पहले ही एक्सटेंशन पर चल रहे थे इसलिए सरकार ने अरुणदेव गौतम को प्रभारी डीजीपी बनाया। मुख्य सचिव अमिताभ जैन के रिटायर होने तक सरकार नए मुख्य सचिव का नाम तय नहीं कर पाई और अमिताभ जैन की सेवा को तीन महीने का विस्तार देना पड़ा। अब सरकार को प्रधान मुख्य वन संरक्षक और मुख्य वन बल संरक्षक का चयन करना है और वह भी इस महीने की आखरी तारीख तक। लगता है कि सरकार इस मामले में भी पुराने प्रदर्शन को दोहरा सकती है। इस आशंका बल इसलिए भी मिल रहा है क्योंकि दो दिन पहले ही विभागीय पदोन्नति समिति की बैठक को टाल दिया गया। जानकार बताते हैं कि इस पद के लिए 1994 बैच के आईएफएस अरुण पांडे और 1995 बैच के ओमप्रकाश यादव का नाम सबसे आगे है। वरिष्ठता के क्रम में कुछ और नाम भी हैं लेकिन इनमें कौशलेन्द्र कुमार के नाम की ज्यादा चर्चा है। बहरहाल, उम्मीद की जा सकती है कि सरकार इसी महीने के अंत तक वन विभेद इन दोनों शीर्ष पदों पर नियुक्ति कर देगी और इसके लिए उसे दिल्ली दरबार की ओर ताकना नहीं पड़ेगा।
इवेंट बन रहा सुशासन तिहार
प्रशासनिक कार्यों में कसावट लाने और प्रशासन को जिम्मेदार बनाने के मकसद से सरकार सुशासन तिहार जैसे आयोजन करती है। छत्तीसगढ़ में पूरे चालीस दिन यह तिहार चलेगा। इसमें पूरे राज्य भर में शिविर लगाए जा रहे हैं और आम लोगों की समस्या का निदान किया जा रहा है। पिछले साल भी सुशासन तिहार मनाया गया जिसमें चालीस लाख से अधिक आवेदन आये उनमे से अधिक से अधिक का निराकरण किया गया ऐसा सरकार का दावा है। इस बार भी शिविर लग रहे हैं अंतर केवल इतना है कि इस बार जनता से आवेदन नहीं मंगाए गए। मतलब समस्या लेकर जाइये और स्पॉट पर ही निदान पाइये। लेकिन क्या सच में ऐसा होता है। मूल निवासी प्रमाण पत्र, जाति प्रमाण पत्र, बिजली का बिल, नाली, पुल पुलिया, सड़क जैसी मूलभूत सुविधाओं को जुटाना तो प्रशासन का रोजमर्रा का काम है फिर यह तिहार क्यों ?? दरअसल इस तरह के आयोजन सरकारों के लिए एक रस्म अदायगी पर्व बनकर रह गए हैं। भूपेश की सरकार भेंट मुलाकात करती थी और उसके पहले डॉक्टर रमन सिंह की सरकार चौपाल लगाती थी। इतना होने के बाद भी आमजनों की तकलीफ कम होने का नाम नहीं ले रही। दिलचस्प बात यह है कि इस तरह के कार्यक्रमों की स्क्रिप्ट लिखने वाले भी कमाल कर रहे हैं। डॉक्टर रमन सिंह भी पेड़ के नीचे बैठकर भोजन करते थे तो भूपेश बघेल और विष्णुदेव साय भी वैसा ही कर रहे हैं। दीवार में ईंट जोड़ने की तस्वीर तीनों मुख्यमंत्रियों की एक जैसी वायरल हुई। और तो और इन तीनों ने मोटरसायकल भी चलाई। स्क्रिप्ट लिखने वालों ने कुछ भी अलग करने की चेष्टा नहीं की। सच तो यह है कि प्रशासन अगर ठीक से काम करे तो ऐसे आयोजनों की जरुरत ही न पड़े और सुशासन को कभी चौपाल या पेड़ के नीचे जाने की भी जरुरत न पड़े। हिंदी के प्रख्यात व्यंग लेखक शरद जोशी कहते थे कि ” जिन्हे आम खाने हैं उनसे पेड़ गिनवाते रहो यही तो सुशासन है ” ……… .

