
कम लागत में गाय, भैंस के लिए चारा उगाएं, दूध की भरपूर मात्रा पाएं
डेयरी किसानों के सामने सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक है पशुओं के लिए पर्याप्त और पौष्टिक चारे की व्यवस्था। बढ़ती महंगाई के कारण बाजार से चारा खरीदना महंगा हो गया है। वहीं दूसरी ओर डेयरी से निकलने वाला गंदा पानी भी किसानों के लिए एक बड़ी समस्या बना रहता है। लेकिन अब इस समस्या का ऐसा समाधान सामने आया है, जिससे डेयरी किसान कम लागत में चारा उगा सकते हैं और दूध उत्पादन में भी जबरदस्त बढ़ोतरी कर सकते हैं।
आइए जानते हैं, कैसे आप डेयरी के गंदे पानी का इस्तेमाल करके पशुओं के लिए कम लागत में पौष्टिक चारा उगा सकते हैं और अपनी आमदनी में बढ़ोतरी कर सकते हैं।
डेयरी के गंदे पानी में होते हैं पोषक तत्व
भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) के अनुसार, डेयरी से निकलने वाला गंदा पानी, जिसमें गोबर, गोमूत्र और स्लरी मिली होती है, अपने आप में पोषक तत्वों का भंडार होता है। अगर इस पानी का सही तरीके से उपयोग किया जाए, तो यह खेती के लिए बेहद फायदेमंद साबित हो सकता है। खासकर नेपियर घास की खेती में इसका उपयोग चमत्कारी असर दिखाता है।
डेयरी किसानों के लिए बड़ी सुविधा
आमतौर पर डेयरी से निकलने वाला गंदा पानी साफ-सफाई और निपटान की दृष्टि से बड़ी समस्या माना जाता है। इस पानी में दुर्गंध, कीचड़ और अपशिष्ट पदार्थ होते हैं, जिससे डेयरी परिसर में स्वच्छता बनाए रखना चुनौतीपूर्ण हो जाता है। साफ-सफाई में थोड़ी सी भी लापरवाही पशुओं के स्वास्थ्य और दूध उत्पादन पर नकारात्मक असर डाल सकती है। लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि यही गंदा पानी नेपियर घास के लिए वरदान साबित हो सकता है। राजस्थान के उदयपुर जिले के डेयरी किसान गौरी शंकर ने इस तकनीक को अपनाकर यह साबित कर दिया है। उन्होंने डेयरी से निकलने वाले गंदे पानी का उपयोग नेपियर घास की सिंचाई में किया, जिससे घास की अच्छी बढ़वार हुई और इस घास को पशुओं को खिलाने पर उनके दूध उत्पादन में बढ़ोतरी दर्ज की गई।
कम खर्च में नेपियर घास की खेती
नेपियर घास की सबसे बड़ी खासियत यह है कि यह जलजमाव वाली जमीन, जिसे स्थानीय भाषा में खलार जमीन कहा जाता है, में भी आसानी से उग जाती है। जहां आम फसलें पानी भरने से खराब हो जाती हैं, वहां नेपियर घास अच्छा उत्पादन देती है। यही वजह है कि डेयरी किसान गंदे पानी का उपयोग सिंचाई के लिए बिना किसी बड़े जोखिम के कर सकते हैं। ICAR के मुताबिक डेयरी किसान करीब 20 दिनों तक गंदे पानी को इकट्ठा कर सकते हैं और फिर नाली या पाइप के माध्यम से इसे नेपियर के खेत में पहुंचा सकते हैं। यदि खेत में पानी की अधिक जरूरत हो, तो इस अंतराल को घटाया भी जा सकता है। इससे नेपियर घास की ग्रोथ तेज होती है और कम समय में ज्यादा हरा चारा उपलब्ध हो जाता है।
पशुओं के लिए बेस्ट क्वालिटी का चारा
नेपियर घास को पशुओं के लिए सबसे बेहतरीन और पौष्टिक चारे में गिना जाता है। शोध में सामने आया है कि इस घास में 13 से 14 प्रतिशत तक प्रोटीन पाया जाता है। इससे पशुओं का दूध उत्पादन बढ़ता है, रोग प्रतिरोधक क्षमता मजबूत होती है और उनकी सेहत बेहतर बनी रहती है। जब किसान अपने खेत में नेपियर घास का उत्पादन करते हैं, तो बाजार से चारा खरीदने की जरूरत काफी हद तक कम हो जाती है। इससे चारे पर होने वाला खर्च बचता है और घर पर ही हरे चारे की निरंतर उपलब्धता बनी रहती है।
लागत कम, मुनाफा ज्यादा
डेयरी के गंदे पानी से नेपियर घास उगाने का यह मॉडल आर्थिक रूप से बेहद लाभदायक है। इससे सिंचाई पर होने वाला खर्च तो बचता ही है, साथ ही रासायनिक खादों की जरूरत भी नहीं पड़ती। यह तकनीक खासतौर पर उन क्षेत्रों के लिए उपयोगी है, जहां सिंचाई के पानी की कमी रहती है। विशेषज्ञों का मानना है कि छोटे और मध्यम डेयरी किसान इस मॉडल को अपनाकर डेयरी से निकलने वाले कचरे को समस्या नहीं, बल्कि अवसर के रूप में देख सकते हैं। कम लागत में चारा उत्पादन, बेहतर दूध उत्पादन और बढ़ी हुई आय, तीनों का लाभ इस तकनीक से मिल सकते हैं।



