
गेहूं को पाले से कैसे बचाएं, जानें, यह कारगर तरीके
पाले से गेहूं की फसल को फायदा होता है लेकिन अत्यधिक पाले से फसल को नुकसान भी हो सकता है, उसमें गलन रोग भी हो सकता है। ऐसे में किसानोें को चाहिए कि वे गेहूं की फसल का ध्यान रखें और किस समय सिंचाई करनी है, किस समय खाद व उर्वरक डालना है आदि बातों का ध्यान रखें तो बेहतर पैदावार प्राप्त की जा सकती है। आज हम गेहूं की फसल को पाले या अत्यधिक सर्दी से बचाव के कुछ कारगर उपाय बता रहे हैं, तो आइए जानते हैं, इसके बारे में।
पाले और शीतलहर से रहे सावधान
इस समय देश के कई हिस्सों में गेहूं की फसल अभी बढ़वार की स्थिति में है और किसानों को पौधों में अच्छी बढ़ोतरी दिखाई दे रही है। लेकिन कृषि विशेषज्ञों की चेतावनी है कि किसान पाले, शीतलहर और रोगों से सावधान रहें। कोहरे से फसल को हल्का लाभ मिल सकता है, लेकिन पाले से पौधे मुरझा सकते हैं और पूरी खेती प्रभावित हो सकती है। कई जगहों पर किसानों ने पहली सिंचाई और खाद का छिड़काव कर दिया है। साथ ही खरपतवार नियंत्रण का काम भी जारी है। ऐसे में किसानों के लिए यह जानना बेहद जरूरी है कि फसल की रक्षा के लिए किन कदमों को अपनाना चाहिए।
संतुलित मात्रा में उर्वरकों का करें प्रयोग
गेहूं की फसल में फॉस्फोरस और पोटाश बुवाई के समय डालना चाहिए, जबकि नाइट्रोजन की आधी-आधी मात्रा पहली और दूसरी सिंचाई में दी जानी चाहिए। विशेषज्ञों का कहना है कि यूरिया का सिंचाई से पहले प्रयोग लाभदायक होता है और इससे 5–10 प्रतिशत तक उपज बढ़ाई जा सकती है। नाइट्रोजन उर्वरकों के लिए ग्रीन सीकर का उपयोग करने से उर्वरक का बेहतर वितरण और 20–25 किलो प्रति हेक्टेयर की बचत भी हो सकती है। इसके अलावा न्यूट्रीएंट एक्सपर्ट सॉफ्टवेयर की सहायता से हर खेत के लिए खाद की मात्रा का सटीक निर्धारण किया जा सकता है।
गोबर और कंपोस्ट की सही मात्रा डालें
फसल के पोषण और मिट्टी की सेहत के लिए खेत में अच्छी सड़ी हुई गोबर या कंपोस्ट की 8–10 टन प्रति हेक्टेयर की दर से साल में दो–तीन बार डालना लाभदायक है। इसके साथ ही गेहूं को 100 किलो नाइट्रोजन और 60 किलो फॉस्फोरस प्रति हेक्टेयर की जरूरत होती है। नाइट्रोजन की आधी और फॉस्फोरस की पूरी मात्रा बुवाई के समय पंक्तियों में डालनी चाहिए। यदि मिट्टी में जिंक की कमी है तो जिंक सल्फेट 25 किलो प्रति हेक्टेयर खेत में बुआई से पहले डालें। लेकिन इससे पहले मिट्टी की जांच अवश्य करा लें।
उन्नत सिंचाई तकनीक का करें इस्तेमाल
सिंचाई के क्षेत्र में नए प्रयोग किए गए हैं। फव्वारा विधि (स्प्रिंकलर) फ्लड इरिगेशन की तुलना में अधिक कारगर पाई गई है। इससे पानी की बचत होती है और उत्पादन में भी बढ़ोतरी होती है। प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना ‘प्रति बूंद से अधिक उपज’ के तहत किसान इस प्रणाली को अपनाकर सरकार से सब्सिडी भी प्राप्त कर सकते हैं। कम पानी वाले क्षेत्रों में यह तकनीक बेहद लाभकारी है। जहां परंपरागत सिंचाई में 30–40 प्रतिशत पानी इस्तेमाल होता है, वहीं सूक्ष्म सिंचाई प्रणाली में 80–90 प्रतिशत तक पानी की बचत होती है।
पाले और गलन रोग से बचाव
पाले से फसल को नुकसान पहुंच सकता है और गलन रोग का खतरा बढ़ जाता है। हल्की सिंचाई और रोग प्रतिरोधी किस्में अपनाने से फसल सुरक्षित रहती है। इसके अलावा फंगल स्प्रे और समय पर पौधों की देखभाल से पाले के प्रभाव को कम किया जा सकता है।
खरपतवार पर नियंत्रण भी जरूरी
गेहूं में चौड़ी और नुकीली पत्तियों वाले खरपतवार जैसे गोयला, चील, पीली सैंजी, प्याजी, गुल्ली डंडा, जंगली जई आदि फसल के लिए हानिकारक हैं। इसकी रोकथाम के लिए बुवाई के दो दिन बाद पेंडीमैथालीन (स्टोम्प) 3.30 लीटर मात्रा को 500 लीटर पानी में घोल बनाकर छिड़काव किया जा सकता है। वहीं फसल जब 30–35 दिन की हो जाए तो 2,4-डी एस्टर साल्ट 72 ई.सी., 1 लीटर मात्रा को 500 लीटर पानी में मिलाकर छिड़काव कर सकते हैं। यदि खेत में गुल्ली डंडा, जंगली जई या फ्लेरिस माइनर की समस्या अधिक है तो आइसाप्रोटूरोन 2 किलो प्रति हेक्टेयर बुवाई के 25–30 दिन बाद छिड़काव करना चाहिए।
किसानों को सलाह
गेहूं की फसल के लिए संतुलित उर्वरक, उन्नत सिंचाई, पाले से बचाव और खरपतवार नियंत्रण बेहद जरूरी हैं। समय रहते इन उपायों को अपनाने से किसान अपनी फसल की पैदावार बढ़ा सकते हैं और उत्पादन को नुकसान से बचा सकते हैं। किसानों को सलाह दी जाती है कि वे मौसम पूर्वानुमान, सरकारी कृषि सलाह और फसल निगरानी का पालन करें। इस प्रकार वे अपनी मेहनत और निवेश की सुरक्षा कर सकते हैं और गेहूं की फसल से बेहतर आय प्राप्त कर सकते हैं।



