विचार

किसान की समृद्धि ही तय करेगी भारत की असली राजनीति

नीतियां सिर्फ़ जीडीपी वृद्धि पर नहीं, बल्कि ग्रामीण समृद्धि पर केंद्रित हों

 

के. पी. मलिक

भारत एक कृषि प्रधान देश रहा है, लेकिन विडंबना यह है कि जिस किसान के श्रम पर देश की खाद्य सुरक्षा टिकी है, वही आज आर्थिक असुरक्षा के सबसे गहरे संकट में फंसा हुआ है। दुनिया की सबसे बड़ी लोकतांत्रिक व्यवस्था होने के बावजूद, भारत में किसानों की स्थिति यह सवाल खड़ा करती है कि क्या लोकतंत्र की शक्ति वास्तव में उस वर्ग तक पहुंच रही है, जो इसकी रीढ़ है?

लोकतंत्र का मूल आधार मतदान है। यही वह ताकत है जिससे सरकारें बनती और बदलती हैं। लेकिन जब मतदान जाति, धर्म, भावनाओं या तात्कालिक नाराजगी के आधार पर होता है, तब नीतियां भी उसी स्तर की बनती हैं—अल्पकालिक, असंतुलित और अक्सर वास्तविक समस्याओं से दूर। किसान, जो संख्या में बड़ा वर्ग है, अगर अपने आर्थिक हितों के आधार पर एकजुट होकर मतदान करे, तो वह न केवल राजनीतिक एजेंडा बदल सकता है, बल्कि नीति निर्माण की दिशा भी तय कर सकता है।

पिछले छह दशकों से अधिक का अनुभव इस बात का साक्षी है कि किसानों के नाम पर घोषणाएं तो बहुत हुईं, लेकिन जमीनी हकीकत नहीं बदली। साल 1965 में ‘न्यूनतम समर्थन मूल्य’ (एमएसपी) की शुरुआत किसानों को उनकी उपज का न्यूनतम लाभकारी मूल्य सुनिश्चित करने के लिए की गई थी। लेकिन आज भी बड़ी संख्या में किसानों को अपनी फसल एमएसपी यानि वाज़िब मूल्य से भी नीचे बेचनी पड़ती है। इसका कारण केवल बाजार की अस्थिरता नहीं, बल्कि सरकारी खरीद व्यवस्था की सीमाएं, भंडारण की कमी का लाभ उठाने वाले बिचौलिए और निजी कंपनियों की बढ़ती पकड़ भी है।

कृषि क्षेत्र में धीरे-धीरे बाजार और कॉर्पोरेट का वर्चस्व बढ़ता चला जा रहा है। जहां एक ओर कंपनियां कृषि उत्पादों के व्यापार से भारी मुनाफा कमा रही हैं, वहीं किसान लागत, कर्ज और अनिश्चित मौसम के बीच पिस रहा है। राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण (एनएसएसओ) और अन्य रिपोर्ट्स बार-बार यह दिखाती हैं कि एक औसत भारतीय किसान की आय आज भी स्थिर नहीं है, जबकि उसकी लागत लगातार बढ़ती जा रही है किसान के खेत में फसल उगाने के लिए उसको बड़ी रकम चुकानी पड़ती है जिसमे बीज, खाद, पानी कीटनाशक, डीजल, बिजली और मजदूरी सब महंगे हो चुके हैं।

प्राकृतिक आपदाएं इस संकट को और गहरा करती हैं। सूखा, बाढ़, ओलावृष्टि जैसी घटनाएं हर साल किसानों को नुकसान पहुंचाती हैं। ‘प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना’ और ‘आपदा प्रबंधन अधिनियम 2005’ जैसे प्रावधान कागज पर तो राहत का आश्वासन देते हैं, लेकिन जमीनी स्तर पर किसानों को मुआवजा पाने के लिए लंबा संघर्ष करना पड़ता है। बीमा क्लेम में देरी, सर्वेक्षण में अनियमितता और भुगतान में पारदर्शिता की कमी जैसी तमाम समस्याएं आम हैं।

एक और गंभीर मुद्दा है कि कृषि भूमि यानि जोत का लगातार कम होना। विकास के नाम पर सड़कों, औद्योगिक परियोजनाओं और शहरी विस्तार के लिए उपजाऊ जमीन अधिग्रहित की जा रही है। सिंचाई जैसी बुनियादी जरूरतों की अनदेखी करते हुए इंफ्रास्ट्रक्चर को प्राथमिकता देना दीर्घकालिक रूप से खाद्य सुरक्षा के लिए खतरा बन सकता है।

राजनीतिक दलों की रणनीति भी इस स्थिति को प्रभावित करती है। चुनाव के समय कर्जमाफी, मुफ्त बिजली, नकद सहायता जैसे वादे किए जाते हैं, जो अल्पकालिक राहत तो देते हैं, लेकिन स्थायी समाधान नहीं बन पाते। इससे किसान एक चक्र में फंसा रहता है कि हर चुनाव में नई उम्मीद, और बाद में वही निराशा।

इस पृष्ठभूमि में किसानों का यह प्रस्ताव कि वे “समान आर्थिक हितों के आधार पर मतदान” करें, एक महत्वपूर्ण राजनीतिक चेतना की ओर इशारा करता है। यह केवल एक नारा नहीं, बल्कि लोकतंत्र को अधिक परिपक्व बनाने की दिशा में एक कदम है। जब किसान “खेत को पानी, फसल को दाम और युवाओं को काम” जैसे ठोस मुद्दों पर एकजुट होंगे, तब राजनीतिक दलों को भी अपनी प्राथमिकताएं बदलनी पड़ेंगी।

इसमे कोई संदेह नहीं है कि भारत की अर्थव्यवस्था तेजी से बढ़ रही है, लेकिन अगर इस विकास में कृषि और किसान पीछे छूट जाते हैं, तो यह असंतुलन सामाजिक और आर्थिक संकट को जन्म देगा। इसलिए यह जरूरी है कि नीतियां केवल जीडीपी वृद्धि पर नहीं, बल्कि ग्रामीण समृद्धि पर भी केंद्रित हों। आख़िरकार यह स्पष्ट है कि भारत का भविष्य खेतों से होकर ही गुजरता है। अगर किसान मजबूत होगा, तो देश मजबूत होगा। और जब किसान अपने मत की शक्ति को पहचानकर उसका उपयोग अपने वास्तविक हितों के लिए करेगा, तभी लोकतंत्र अपने सही अर्थों में सफल होगा।

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