
ICAR की लो टनल तकनीक: सर्दियों में उगाएं ऑफ सीजन सब्जियां
भारत में लोगों का खानपान बदल रहा है। अब रोजाना के भोजन में ऑफ सीजन सब्जियां ज्यादा पंसद की जाती है। सामान्यत: ऑफ सीजन में पैदा होने वाली सब्जियां बाजार में महंगे दामों पर बिकती है। अगर किसान सर्दी के मौसम में गर्मियों में पसंद की जाने वाली सब्जियों की खेती करें और सीजन आने से पहले अपनी सब्जियां बेच दें तो अच्छा खासा मुनाफा कमा सकता है। हर राज्य व शहर में ऐसे कुछ प्रगतिशील किसान मिल जाते हैं जो ऑफ सीजन सब्जियों की खेती से हर महीने लाखों रुपए कमा रहे हैं।
ऑफ सीजन खेती को प्रोत्साहन देने के लिए इंडियन काउंसिल ऑफ एग्रीकल्चरल रिसर्च (ICAR) ने लो टनल तकनीक विकसित की है। इस तकनीक को अपनाकर किसान सर्दी के मौसम में ऑफ सीजन सब्जियों की खेती कर सकते हैं। आइए ट्रैक्टर जंक्शन की इस पोस्ट में जानें कि लो टनल तकनीक क्या है, इससे खेती कैसे की जाती है, कौन-कौन सी सब्जियों की खेती की जा सकती है और कितनी लागत आती है?
क्या है लो-टनल तकनीक?
लो-टनल तकनीक एक वैज्ञानिक और किफायती खेती विधि है, जिसमें सब्जियों की कतारों के ऊपर लचीली पारदर्शी प्लास्टिक शीट लगाई जाती है। यह शीट पौधों को ठंडी हवा, पाले और बारिश से बचाती है और उनके आसपास की हवा को गर्म बनाए रखती है।
इससे पौधे तेजी से बढ़ते हैं और फसल सामान्य मौसम से 30–40 दिन पहले तैयार हो जाती है। यह तकनीक ICAR (भाकृअनुप) द्वारा विकसित की गई है और संस्था ने हाल ही में सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘एक्स (X)’ पर किसानों को इसे अपनाने की सलाह दी है।
लो-टनल तकनीक के फायदे
लो-टनल तकनीक अपनाने से किसानों को कई तरह के फायदे मिलते हैं:
- सर्द मौसम से बचाव: यह तकनीक पौधों को ठंड, पाले और बारिश से पूरी तरह सुरक्षित रखती है। जब सर्दी के मौसम में तापमान बहुत नीचे चला जाता है, तब यह प्लास्टिक कवर पौधों के आसपास गर्म वातावरण बनाए रखता है, जिससे फसल को नुकसान नहीं होता। इसके अलावा, यह तकनीक पौधों को तेज हवाओं के झोंकों से भी बचाती है, जिससे उनकी बढ़वार बेहतर होती है।
- फसल जल्द तैयार: इस तकनीक की मदद से किसान अपनी फसल सामान्य खेती की तुलना में करीब 30 से 40 दिन पहले तैयार कर सकते हैं। यानी फसल जल्दी बाजार में पहुंच जाती है और किसान जल्दी मुनाफा कमा सकते हैं।
- कम लागत: इसकी लागत भी बहुत कम आती है। एक बार लगाने पर यह संरचना लंबे समय तक उपयोग की जा सकती है।
- सब्जियों के ऊंचे दाम: सबसे खास बात यह है कि जब बाजार में सब्जियों की कमी होती है, तब लो-टनल तकनीक से तैयार फसल ऊंचे दामों पर बिकती है। इससे किसानों की आमदनी में अच्छी बढ़ोतरी होती है और उन्हें ठंड के मौसम में भी स्थिर आय का साधन मिल जाता है।
लो-टनल का निर्माण: सामग्री और विधि
ICAR के अनुसार, लो-टनल संरचना बनाना बेहद आसान है और इसके लिए जटिल उपकरणों की जरूरत नहीं होती। आवश्यक सामग्री और निर्माण विधि इस प्रकार है:
आवश्यक सामग्री:
- ढांचे के लिए: जस्ती लोहे की रॉड (1.5 से 2.5 मीटर लंबाई)
- आवरण के लिए: 100 माइक्रॉन IR ग्रेड की पारदर्शी प्लास्टिक शीट
निर्माण विधि:
- खेत में सब्जी की कतारें तैयार करें।
- लोहे की रॉड्स को मोड़कर कमान का आकार दें और दोनों सिरों को जमीन में गाड़ दें।
- इन कमानों पर पारदर्शी प्लास्टिक शीट चढ़ा दें।
- ढांचे की ऊंचाई 40 से 60 सेंटीमीटर रखें।
- पौधों की रोपाई एक दूसरे से 50 सेंटीमीटर की दूरी पर करें और ड्रिप सिंचाई व्यवस्था लगाएं।
- दो कतारों के बीच 1.5 से 1.6 मीटर का फासला रखें ताकि हवा का संचार ठीक से हो सके।
किन फसलों के लिए है उपयुक्त?
लो-टनल तकनीक मुख्यतः खीरा, तुरई, करेला, लौकी, टमाटर, मिर्च, बैंगन, पत्ता गोभी, फूल गोभी, ब्रोकली आदि सब्जियों की खेती के लिए अत्यंत उपयोगी है।
लो-टनल तकनीक अपनाते समय इन सावधानियों का रखें ध्यान
हमेशा अच्छी गुणवत्ता की प्लास्टिक शीट का उपयोग करें ताकि वह धूप और बारिश दोनों झेल सके। दिन में तापमान बढ़ने पर शीट को थोड़ा खोलें ताकि पौधों को पर्याप्त ऑक्सीजन मिल सके। सिंचाई प्रणाली की नियमित जांच करें। यदि फसलों में कीट या रोग दिखे तो समय पर जैविक दवाओं का प्रयोग करें।



