खेती संसार

मानसून में करें ककोड़ा की खेती, कमाएं बढ़िया मुनाफा

बरसात के मौसम में किसान विभिन्न प्रकार की सब्ज़ियों की खेती करते हैं, लेकिन कुछ फसलें ऐसी होती हैं जो विशेष रूप से इस मौसम में खूब फलती-फूलती हैं और अच्छी आमदनी देती हैं। ऐसी ही एक सब्ज़ी है ककोड़ा, जिसे अलग-अलग क्षेत्रों में काटवल, परोड़ा या खेख्सी के नाम से भी जाना जाता है। यह सब्जी न केवल स्वादिष्ट होती है, बल्कि इसके औषधीय गुणों के कारण बाजार में इसकी मांग भी काफी अधिक रहती है।

ककोड़ा की खासियत

ककोड़ा एक बहुवर्षीय कद्दूवर्गीय सब्ज़ी है, जिसके ऊपर मुलायम कांटे होते हैं। यह पौष्टिकता से भरपूर होती है और सब्ज़ी व अचार दोनों रूपों में उपयोग की जाती है। आयुर्वेद के अनुसार, यह कफ, वात और पित्त को संतुलित करती है तथा मधुमेह रोगियों के लिए भी लाभकारी है। इसकी जड़ें बवासीर, पेशाब की समस्या और बुखार जैसी बीमारियों में उपयोगी मानी जाती हैं।

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ककोड़ा की फसल 2-3 महीने में तैयार हो जाती है। एक बार लगाने पर इसके मादा पौधे से 8-10 वर्षों तक फल मिलते हैं। बाजार में इसकी शुरुआती कीमत ₹90-₹100 प्रति किलो रहती है, जबकि मांग बढ़ने पर यह ₹150 तक पहुंच सकती है। उदाहरण के लिए, महाराष्ट्र के भोकर तहसील के आनंद बोइनवाड ने 3 एकड़ में ककोड़ा की खेती कर 60-70 क्विंटल उत्पादन प्राप्त किया और ₹15,000 प्रति क्विंटल के हिसाब से करीब ₹9 लाख की कमाई की। लागत निकालने के बाद भी उन्हें ₹8 लाख तक का लाभ मिला।

उन्नत किस्में

इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय ने ककोड़ा की उन्नत किस्म इंदिरा ककोड़ा-1 (RMF-37) विकसित की है, जो उत्तर प्रदेश, ओडिशा, छत्तीसगढ़, झारखंड, मध्यप्रदेश और महाराष्ट्र जैसे राज्यों में उगाई जा सकती है। यह किस्म कीट प्रतिरोधी है और 35-40 दिन में तुड़ाई योग्य हो जाती है। पहले वर्ष में प्रति एकड़ 4 क्विंटल, दूसरे वर्ष 6 क्विंटल और तीसरे वर्ष 8 क्विंटल तक उत्पादन देती है। अन्य प्रमुख किस्में हैं – अम्बिका-12-1, अम्बिका-12-2 और अम्बिका-12-3

खेती की विधि

  • मिट्टी: रेतीली दोमट मिट्टी जिसमें अच्छा जल निकास हो, सबसे उपयुक्त रहती है। पीएच मान 6-7 होना चाहिए।

  • बुवाई: एक हेक्टेयर क्षेत्र में 8-10 किलो बीज या 10,000 कंदों की आवश्यकता होती है।

  • बीज रोपण: क्यारियों या गड्ढों में 1 मीटर की दूरी पर रोपाई करें। प्रत्येक गड्ढे में 2-3 बीज लगाएं, जिनमें से एक नर और बाकी मादा पौधे होने चाहिए।

उर्वरक और सिंचाई

  • अंतिम जुताई में 200-250 क्विंटल सड़ी गोबर खाद मिलाएं।

  • प्रति हेक्टेयर 65 किलोग्राम यूरिया, 375 किलोग्राम एसएसपी और 67 किलोग्राम एमओपी डालें।

  • वर्षा काल में सिंचाई की ज़रूरत कम होती है, लेकिन लंबे अंतराल पर सिंचाई अवश्य करें।

  • जल निकास की समुचित व्यवस्था आवश्यक है, ताकि जलभराव से कंद या बीज खराब न हों।

खरपतवार नियंत्रण और सहारा

खरपतवारों से बचाव के लिए 2-3 बार गुड़ाई करें। बेल को सहारा देने के लिए डंडे, तार आदि का उपयोग करें ताकि बेल ठीक से बढ़ सके और फल अच्छे मिल सकें।

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