
बढ़ते तापमान में गेहूं की फसल कैसे बचाएं? जानें हीट स्ट्रेस से बचाव के प्रभावी उपाय
देश के कई हिस्सों में तापमान तेजी से बढ़ रहा है, जिससे गेहूं की फसल पर हीट स्ट्रेस (गर्मी का तनाव) का खतरा बढ़ गया है। इसी को देखते हुए करनाल स्थित भारतीय गेहूं एवं जौ अनुसंधान संस्थान (IIWBR) ने गेहूं उत्पादक किसानों के लिए 15 मार्च तक विशेष कृषि एडवाइजरी जारी की है। संस्थान ने स्पष्ट किया है कि इस समय फसल संवेदनशील अवस्था में है, इसलिए सिंचाई, पोषण और रोग-कीट प्रबंधन में विशेष सावधानी बरतना जरूरी है।
सिंचाई प्रबंधन पर दें विशेष जोर
संस्थान के अनुसार, गेहूं की फसल में इस समय विवेकपूर्ण सिंचाई प्रबंधन बेहद अहम है। किसानों को सलाह दी गई है कि सिंचाई से पहले मौसम पूर्वानुमान अवश्य देखें। यदि बारिश की संभावना हो तो सिंचाई टाल दें, ताकि खेत में जलभराव की स्थिति न बने। अधिक पानी से जड़ें कमजोर हो सकती हैं और फसल गिरने (लॉजिंग) का खतरा बढ़ जाता है। हवा की गति को ध्यान में रखना भी जरूरी है। जब हवा की रफ्तार कम हो, विशेषकर शाम के समय, तभी सिंचाई करें। तेज हवा के दौरान सिंचाई करने से फसल झुक सकती है, जिससे दाना भराव प्रभावित होता है। संस्थान ने यह भी कहा है कि दाना भराव की अवस्था में अंतिम सिंचाई अवश्य करें। इससे दाने सिकुड़ने से बचते हैं और गर्मी के असर को कम किया जा सकता है।
हीट स्ट्रेस से बचाव के क्या करें
यदि लगातार तीन दिनों तक तापमान सामान्य से अधिक बना रहता है, तो किसान फसल को बचाने के लिए विशेष पोषक तत्वों का छिड़काव कर सकते हैं। फूल आने के बाद 0.2% म्यूरेट ऑफ पोटाश का छिड़काव करें। इसके लिए 200 लीटर पानी में 400 ग्राम म्यूरेट ऑफ पोटाश घोलें। वैकल्पिक रूप से 200 लीटर पानी में 4 किलोग्राम पोटेशियम नाइट्रेट घोलकर छिड़काव किया जा सकता है। इन घोलों का छिड़काव करने से गर्मी के तनाव को कम करने में मदद मिलती है और दाना भराव बेहतर होता है। वहीं दक्षिणी हरियाणा और उत्तरी राजस्थान जैसे अत्यधिक तापमान वाले क्षेत्रों में दोपहर 2 से 2:30 बजे के बीच लगभग एक घंटे के लिए स्प्रिंकलर सिंचाई करने की भी सलाह दी गई है। इससे खेत का तापमान कुछ हद तक नियंत्रित किया जा सकता है।
लीफ ऐफिड (चेपा) पर कैसे करें नियंत्रण
इस समय गेहूं की फसल में लीफ ऐफिड (चेपा) का प्रकोप भी बढ़ सकता है। किसानों को नियमित रूप से फसल का निरीक्षण करना चाहिए। यदि ऐफ़िड की संख्या आर्थिक नुकसान स्तर (10-15 ऐफिड प्रति टिलर) से अधिक हो जाए, तो नियंत्रण उपाय अपनाएं। इसके लिए 400 मिली क्विनॉलफॉस ईसी को 200-250 लीटर पानी में मिलाकर एक एकड़ क्षेत्र में छिड़काव करें। समय पर नियंत्रण करने से उत्पादन हानि को रोका जा सकता है।
रतुआ रोग नियंत्रण के लिए यह करें उपाय
संस्थान ने पीले (धारीदार), भूरे और काले रतुआ रोग को लेकर भी चेतावनी जारी की है। यदि खेत में इन रोगों के लक्षण दिखाई दें और पुष्टि हो जाए, तो तुरंत प्रोपिकोनाजोल 25 ईसी का छिड़काव करें। इसके लिए एक लीटर पानी में 1 मिली दवा मिलाने के अनुपात से घोल तैयार करें। इस तरह 200 मिली फफूंदनाशक को 200 लीटर पानी में मिलाकर एक एकड़ फसल में छिड़काव किया जा सकता है। छिड़काव साफ मौसम में करें, जब बारिश, कोहरा या ओस न हो।
कटाई के समय बरतें यह सावधानी
जिन क्षेत्रों में फसल पक चुकी है, विशेषकर प्रायद्वीपीय इलाकों और सीमित सिंचाई वाले क्षेत्रों में, वहां कंबाइन रिपर से कटाई करना उपयुक्त रहेगा। यदि कटाई हाथ से की जाए, तो फसल को थ्रेसिंग से पहले उचित नमी स्तर तक सुखाना जरूरी है, ताकि दाने की गुणवत्ता बनी रहे।
बढ़ते तापमान में भी मिल सकता है सुरक्षित उत्पादन
बढ़ते तापमान के बीच गेहूं की फसल को सुरक्षित रखने के लिए समय पर सिंचाई, संतुलित पोषण और रोग-कीट प्रबंधन अत्यंत आवश्यक है। मौसम पूर्वानुमान पर नजर रखते हुए वैज्ञानिक अनुशंसाओं का पालन करने से हीट स्ट्रेस के प्रभाव को काफी हद तक कम किया जा सकता है। सही प्रबंधन से न केवल उत्पादन सुरक्षित रहेगा, बल्कि दाने की गुणवत्ता भी बेहतर बनी रहेगी।



