
गौ सेवा में समर्पित एक संघ प्रचारक की प्रेरक गाथा
संघ के 100 साल : लोन वर्राटू से गौ संवर्धन तक एक प्रचारक का बलिदान

संघ का शताब्दी वर्ष
रायपुर : राजारामजी का जीवन गौ माता और राष्ट्र सेवा के प्रति अनन्य समर्पण का प्रतीक है। 2 अगस्त 1960 को राजस्थान के बारां जिले के टांचा गांव में जन्मे राजारामजी की औपचारिक शिक्षा भले ही 11वीं कक्षा तक सीमित रही, लेकिन उनकी गौ सेवा और समाज के प्रति निष्ठा असाधारण थी। 1977 में आपातकाल के बाद राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के संपर्क अभियान से जुड़कर उन्होंने अपने जीवन की दिशा तय की और 1981 में घर-परिवार त्यागकर पूर्णकालिक प्रचारक बन गए।
संघ के प्रचारक के रूप में यात्रा
राजारामजी का प्रचारक जीवन 1981 में बिलाडा (राजस्थान) में तहसील प्रचारक के रूप में शुरू हुआ। 1985 में वे धौलपुर के जिला प्रचारक बने। उसी दौरान पंजाब में खालिस्तान आंदोलन अपने चरम पर था। इस संकटकाल में जब संघ की शाखा पर आतंकी हमला हुआ, तब भी देशभर से साहसी और धैर्यवान प्रचारकों ने पंजाब का रुख किया। 1986 में राजारामजी को रोपड़ (पंजाब) वर्तमान रूपनगर में जिला प्रचारक की जिम्मेदारी सौंपी गई। उन्होंने न केवल पंजाबी भाषा और संस्कृति को आत्मसात किया, बल्कि स्थानीय लोगों के साथ गहरा जुड़ाव स्थापित किया। 1992 तक रोपड़ में सेवा के बाद, उन्होंने 1992 से 1995 तक किसान संघ के संगठन मंत्री के रूप में कार्य किया। इसके बाद 1995-98 तक कपूरथला और 1998-2002 तक फरीदकोट में जिला प्रचारक रहे। 2002 से वे पंजाब में ग्राम विकास प्रमुख और 2004-06 तक पटियाला विभाग प्रचारक रहे। बाद में उन्हें पंजाब में गौ संवर्धन प्रमुख की जिम्मेदारी दी गई।
गौ सेवा ही जीवन का ध्येय
राजारामजी के लिए गौ सेवा भगवान श्रीकृष्ण की भक्ति के समान थी। उनके हंसमुख और प्रेरक स्वभाव ने उन्हें हर कार्य में लोगों को जोड़ने में मदद की। उनके अथक प्रयासों से पंजाब में गौ सेवा बोर्ड का गठन हुआ और गौ हत्या विरोधी कानून को और सख्त किया गया। राजारामजी का मानना था कि गौचर भूमि पर प्रभावशाली लोगों के अवैध कब्जे गायों की दुर्दशा का प्रमुख कारण हैं। इस समस्या से निपटने के लिए उन्होंने गौचर भूमि मुक्ति आंदोलन शुरू किया, जिसके परिणामस्वरूप पंजाब सरकार ने तीन सदस्यीय समिति गठित की।
अंतिम क्षणों तक गौ भक्ति
2013 में हृदय रोग से पीड़ित होने के बावजूद राजारामजी गौ सेवा के प्रति अपनी प्रतिबद्धता से पीछे नहीं हटे। चिकित्सकों ने शल्य चिकित्सा की सलाह दी, लेकिन वे गौ-विज्ञान परीक्षा की तैयारियों और गौ सेवा कार्यों में डटकर लगे रहे। 24 नवंबर 2013 को मंडी गोविंदगढ़ में स्वामी कृष्णानंदजी की गौ-कथा के दौरान स्वामीजी से चर्चा के बीच उन्हें गंभीर हृदयाघात हुआ और वे भारत माता के चरणों में समर्पित हो गए।
एक प्रेरक विरासत
राजारामजी का जीवन गौ माता और राष्ट्र के प्रति समर्पण का जीवंत उदाहरण है। पंजाब जैसे चुनौतीपूर्ण क्षेत्र में उन्होंने न केवल संघ के विचारों को मजबूत किया, बल्कि गौ सेवा के माध्यम से सामाजिक परिवर्तन की नींव रखी। उनका बलिदान और समर्पण आज भी लाखों लोगों के लिए प्रेरणा का स्रोत है। गौ भक्त और संघ प्रचारक के रूप में उनकी यह यात्रा ‘लोन वर्राटू’ की तरह समाज को सकारात्मक दिशा दिखाती रहेगी।



