
क्या बासमती की बदल रही है भौगोलिक परिस्थिति
बासमती पर जीआई की साख, किसानों की आय और सरकारी नीति
यदि बाजार में बड़ी मात्रा में गैर-जीआई क्षेत्रों की उपज आने लगे और उसे बासमती के नाम से व्यापारिक प्रतिस्पर्धा में उतार दिया जाए, तो इसका सीधा असर पारंपरिक उत्पादकों की आय पर पड़ सकता है। यह चिंता निराधार नहीं है।

के. पी. मलिक
भारत का बासमती केवल एक कृषि उत्पाद नहीं, बल्कि देश की वैश्विक कृषि पहचान का प्रतीक है। इसकी सुगंध, स्वाद और लंबे दाने जितने प्रसिद्ध हैं, उससे कहीं अधिक महत्वपूर्ण उसकी भौगोलिक पहचान (ज्योग्राफिकल इंडिकेशन यानि जीआई) है। यही कारण है कि विश्व बाजार में भारतीय बासमती को सामान्य चावल की तुलना में अधिक मूल्य मिलता है। लेकिन पिछले कुछ वर्षों में एक नया संकट उभर रहा है। बासमती की खेती तेजी से उन क्षेत्रों तक फैल रही है जो जीआई अधिसूचित क्षेत्र का हिस्सा नहीं हैं। यह केवल खेती का विस्तार नहीं, बल्कि कृषि नीति, किसान हित, बाजार संतुलन और अंतरराष्ट्रीय व्यापार से जुड़ा गंभीर सवाल बन चुका है।
यह निर्विवाद है कि मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, तेलंगाना और कुछ अन्य राज्यों में बासमती जैसी किस्मों की खेती बढ़ी है। इसका सबसे बड़ा कारण वहां बीज उत्पादन, निजी कंपनियों की सक्रियता और अधिक लाभ की उम्मीद है। किसानों के दृष्टिकोण से यह स्वाभाविक है। यदि किसी फसल से अधिक आमदनी की संभावना दिखाई देती है, तो किसान उसकी ओर आकर्षित होंगे। इसलिए इस पूरे विवाद में किसानों को दोषी ठहराना उचित नहीं होगा; असली सवाल नीति और नियमन का है।
जीआई का उद्देश्य किसी फसल के नाम पर एकाधिकार स्थापित करना नहीं, बल्कि उस विशिष्ट भौगोलिक पहचान, गुणवत्ता और प्रतिष्ठा की रक्षा करना है जो वर्षों की प्राकृतिक परिस्थितियों और पारंपरिक कृषि पद्धतियों से विकसित हुई है। यदि बाजार में बड़ी मात्रा में गैर-जीआई क्षेत्रों की उपज आने लगे और उसे बासमती के नाम से व्यापारिक प्रतिस्पर्धा में उतार दिया जाए, तो इसका सीधा असर पारंपरिक उत्पादकों की आय पर पड़ सकता है। यह चिंता निराधार नहीं है।
दूसरी ओर, केवल प्रतिबंध लगाने की मांग भी अपने आप में पर्याप्त समाधान नहीं है। यदि किसी राज्य में विधिवत विकसित और अधिसूचित बासमती किस्मों की खेती कानूनन प्रतिबंधित नहीं है, तो केवल प्रशासनिक आदेशों के आधार पर खेती रोकना कानूनी, आर्थिक और संघीय ढांचे तीनों स्तरों पर चुनौतीपूर्ण हो सकता है। इसलिए यह मुद्दा केवल “रोक लगाओ” या “रोक मत लगाओ” का नहीं, बल्कि स्पष्ट राष्ट्रीय नीति का है।
सबसे बड़ी चिंता बाजार में मूल्य असंतुलन की है। जब गैर-जीआई क्षेत्रों से अपेक्षाकृत कम कीमत पर बड़ी मात्रा में बासमती जैसी उपज बाजार में आती है, तो व्यापारी उसी का उपयोग कीमतें नीचे लाने के लिए करते हैं। इसका नुकसान सबसे पहले पंजाब, हरियाणा, पश्चिमी उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड और जम्मू-कश्मीर जैसे पारंपरिक उत्पादक क्षेत्रों के किसानों को उठाना पड़ता है। जिन्होंने दशकों तक भारतीय बासमती की वैश्विक प्रतिष्ठा बनाई, वही आज मूल्य दबाव का सामना कर रहे हैं।
इसका दूसरा आयाम निर्यात से जुड़ा है। आज वैश्विक बाजार केवल गुणवत्ता नहीं, बल्कि ट्रेसबिलिटी और भौगोलिक प्रमाणिकता भी मांगता है। यूरोप, खाड़ी देशों और अन्य आयातक बाजारों में जीआई प्रमाणन की विश्वसनीयता लगातार महत्वपूर्ण होती जा रही है। यदि उत्पादन और विपणन के बीच स्पष्ट अंतर नहीं रखा गया, तो भारतीय बासमती की सामूहिक ब्रांड वैल्यू प्रभावित हो सकती है। यह केवल किसानों का नहीं, बल्कि देश के कृषि निर्यात का भी प्रश्न है। हालाँकि, एक और पक्ष भी उतना ही महत्वपूर्ण है।
यदि गैर-जीआई क्षेत्रों के किसानों को बासमती जैसी फसलों से दूर रखा जाता है, तो सरकार का दायित्व है कि वह उनके लिए समान लाभ देने वाली वैकल्पिक फसलें, बेहतर खरीद व्यवस्था और बाजार उपलब्ध कराए। केवल प्रतिबंध किसानों के लिए समाधान नहीं हो सकता। कृषि नीति का उद्देश्य अवसरों को बंद करना नहीं, बल्कि उन्हें वैज्ञानिक और न्यायसंगत ढंग से व्यवस्थित करना होना चाहिए।
इस पूरे विवाद में सबसे अधिक जवाबदेही सरकार और नियामक संस्थाओं की बनती है। यदि जीआई क्षेत्रों के बाहर बीज उत्पादन और वितरण अनियंत्रित है, तो बीज प्रमाणीकरण एजेंसियाँ, कृषि विश्वविद्यालय, राज्य सरकारें और संबंधित केंद्रीय संस्थाएँ अब तक क्या कर रही थीं? यदि स्थिति इतनी गंभीर हो चुकी है, तो इसका अर्थ है कि नियामक तंत्र समय रहते प्रभावी हस्तक्षेप करने में सफल नहीं रहा। अब समय आ गया है कि केंद्र सरकार, एपीईडीए, कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय, राज्य सरकारें और जीआई से जुड़े सभी हितधारक मिलकर एक स्पष्ट राष्ट्रीय बासमती नीति तैयार करें। इसमें तीन सिद्धांत होने चाहिए जैसे जीआई की विश्वसनीयता की रक्षा, पारंपरिक उत्पादकों के आर्थिक हितों की सुरक्षा और गैर-जीआई राज्यों के किसानों के लिए व्यवहार्य वैकल्पिक कृषि मॉडल।
दरअसल, बासमती भारत की कृषि विरासत है। यदि इसकी विशिष्ट पहचान कमजोर होती है, तो नुकसान केवल किसी एक राज्य का नहीं होगा, बल्कि पूरे देश के कृषि निर्यात और वैश्विक ब्रांड मूल्य का होगा। लेकिन यदि समाधान केवल प्रतिबंधों पर आधारित होगा, तो उससे नए क्षेत्र के किसानों में असंतोष भी बढ़ेगा।
इसलिए आवश्यकता भावनात्मक प्रतिक्रिया की नहीं, बल्कि वैज्ञानिक, कानूनी और आर्थिक दृष्टि से संतुलित नीति की है। आख़िरकार, सवाल सिर्फ़ यह नहीं कि बासमती कहाँ उगाई जाए; असली सवाल यह है कि भारत अपनी सबसे मूल्यवान कृषि पहचान की रक्षा किस तरह करे, ताकि किसान भी सुरक्षित रहें, निर्यात भी बढ़े और दुनिया में “इंडियन बासमती” का भरोसा भी।



