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गेहूं की फसल में पोटाश क्यों जरूरी? जानें फायदे, लक्षण और सही उपयोग

भारत में गेहूं और जीरा दोनों ही किसानों के लिए बेहद महत्वपूर्ण फसलें हैं. गेहूं जहां देश की प्रमुख रबी फसल है, वहीं जीरा भारत का एक अहम मसाला है, जिसकी देश ही नहीं विदेशों में भी भारी मांग रहती है। अच्छी पैदावार के लिए सिर्फ सही बीज या सिंचाई काफी नहीं है, बल्कि मिट्टी में पोषक तत्वों का संतुलन भी उतना ही जरूरी है। इन्हीं जरूरी पोषक तत्वों में से एक है पोटाश, जो फसल को मजबूती, रोग–प्रतिरोध और विपरीत मौसम से सुरक्षा प्रदान करता है।

गेहूं को क्यों चाहिए पोटाश

कृषि वैज्ञानिकों के अनुसार, फसल को विकास व उत्पादन के लिए 17 आवश्यक पोषक तत्व चाहिए। इनमें कार्बन, हाइड्रोजन और ऑक्सीजन तो पानी और हवा से मिल जाते हैं, लेकिन बाकी पोषक तत्व किसानों को खाद व उर्वरकों के रूप में देने होते हैं। पोटाश इन महत्वपूर्ण पोषक तत्वों में से एक प्रमुख तत्व है, जो पौधों की वृद्धि, दाना भराव, गुणवत्ता और मजबूती सुनिश्चित करता है। आजकल गेहूं की अधिक उपज देने वाली किस्मेंमाइक्रो–इरिगेशन और आधुनिक कृषि तकनीक उपयोग में आने से मिट्टी से पोषक तत्वों का तेजी से कमी हो रही है। ऐसे में पोटाश की कमी अब खुलकर दिखाई देने लगी है, जिसकी भरपाई करना किसानों के लिए अनिवार्य हो गया है।

पोटाश की कमी से क्या होती है समस्या

  • पोटाश की कमी का असर गेहूं की फसल पर समान रूप से पड़ता है।
  • पौधे कमजोर होकर झुकने या गिरने लगते हैं।
  • दाने या फलियां ठीक से नहीं भरतीं है।
  • कीटों और रोगों का प्रकोप तेजी से बढ़ता है।
  • मौसम की मार (पाला, सूखा, ओला) जल्दी प्रभाव डालती है।

पौधों की जड़ें कमजोर बनती हैं, जिससे नमी और पोषक तत्वों का सही अवशोषण नहीं हो पाता है।

पोटाश फसल को कैसे बनाता है मजबूत

रोग–प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाता है पोटाश: पोटाश पौधों की कोशिकाओं को मजबूत बनाता है, जिससे रोग, कीट और फफूंद का हमला काफी कम हो जाता है। गेहूं में करनाल बनावट, झुलसा रोग और फफूंद का असर कम होता है। इससे फसल स्वस्थ बनी रहती है और उपज में सुधार होता है।

विपरीत मौसम से देता है सुरक्षा : पोटाश सूखा, पाला, तेज हवा और ठंड जैसे विपरीत मौसम से लड़ने में पौधे की सहायता करता है। गेहूं में पाला पड़ने पर पत्तियों का झुलसना कम होता है।

जड़ों को बनाता है मजबूत: पोटाश पौधों की जड़ें विकसित करता है, जिससे वे मिट्टी से पानी और पोषक तत्व बेहतर ढंग से ले पाते हैं। गेहूं में जड़ें गहरी और मजबूत बनती हैं।

दाना भराव और गुणवत्ता में बढाेतरी:  पोटाश दाने के आकार, वजन और चमक को सुधारने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। गेहूं में दाना मोटा, सुनहरा और अधिक वजन वाला बनता है। इससे बाजार में बेहतर कीमत मिलती है और किसानों की आय बढ़ती है।

संतुलित उर्वरक प्रबंधन भी जरूरी

गेहूं की फसल के लिए सिर्फ नाइट्रोजन और फास्फोरस देना पर्याप्त नहीं है। कृषि वैज्ञानिक सलाह देते हैं कि किसान सदैव मिट्टी की जांच कराकर उर्वरकों की मात्रा तय करें। पोटाश की सही मात्रा देने से फसल स्वस्थ रहती है, उत्पादन बढ़ता है और मिट्टी की उर्वरता लंबे समय तक बनी रहती है। गेहूं की खेती में पोटाश एक सुरक्षा कवच की तरह काम करता है। यह फसल को रोग, कीट, पाले, सूखे और तेज हवा से बचाकर उसकी गुणवत्ता और उपज में उल्लेखनीय बढ़ोतरी करता है। यदि किसान संतुलित उर्वरक प्रबंधन अपनाते हैं और मिट्टी की जरूरत के अनुसार पोटाश की मात्रा देते हैं, तो गेहूं की पैदावार में काफी सुधार देखा जा सकता है।

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